डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। शास्त्रों में प्रदोष व्रत भगवान शिव की विशेष कृपा पाने का दिन है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार प्रदोष व्रत त्रयोदशी के दिन रखा जाता है। प्रत्येक महीने में दो प्रदोष व्रत होते हैं, जो दिन के नामानुसार जाने जाते हैं। इस बार यह तिथि 14 अक्टूबर, बुधवार को है। जो प्रदोष व्रत बुधवार के दिन पड़ता है उसे बुध प्रदोष कहते हैं। बुध प्रदोष व्रत से कोई भी कर्ज से मुक्ति पाने के साथ ही नौकरी में अपनी तरक्की के रास्ते खोल सकता है।
इस दिन व्रत रखने से भक्तों के अन्दर सकारात्मक विचार आते हैं और वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। प्रदोष व्रत का पूजन शाम के समय सूर्यास्त से पहले और ठीक बाद में किया जाता है। आइए जानते हैं पूजन विधि और इसका महत्व...
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दान का महत्व
शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों को दान देने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि 'एक दिन जब चारों ओर अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगा। व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यों को अधिक करेगा। उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करेगा, उस पर शिव जी की कृपा होगी। इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म-जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है। उसे उत्तम लोक की प्राप्ति होती है।
पूजा विधि
- प्रदोष व्रत करने के लिए व्रती को त्रयोदशी के दिन सुबद सूर्योदय से पहले उठना चाहिए।
- नित्यकर्मों से निवृ्त होकर भोले नाथ का स्मरण करें।
- व्रत में आहार नहीं लिया जाता है।
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- पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से पहले स्नानादि कर श्वेत वस्त्र धारण करें।
- पूजन स्थल को शुद्ध करने के बाद गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार करें।
- इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाएं।
- उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान शिव का पूजन करें।
- पूजन में भगवान शिव के मंत्र 'ऊँ नम: शिवाय' का जाप करते हुए जल चढ़ाएं।
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